Rumi Shayari in Hindi
Rumi Shayari in Hindi : जीवन को समझने के लिए पढ़ें रूमी के सर्वश्रेष्ठ विचार हिंदी में
Rumi shayari Quotes in Hindi : जीवन एक खूबसूरत यात्रा है, जिसमें हम खुशियों, शांति और अपने अस्तित्व के अर्थ को खोजते हैं। इस यात्रा को गहराई से समझने में रूमी के विचार हमारी मदद कर सकते हैं। रूमी, जो एक महान सूफी कवि और विचारक थे, ने अपने शब्दों के जरिए हमें जीवन, प्रेम और आत्मा की गहराई को समझने का रास्ता दिखाया है।
इस में हम रूमी के कुछ बेहतरीन विचारों (Rumi Quotes in Hindi) को हिंदी में आपके साथ साझा करेंगे, जो न सिर्फ प्रेरणा देंगे, बल्कि जीवन को एक नई दिशा में देखने की ताकत भी देंगे। आइए, इन अनमोल विचारों से सीखें और अपने जीवन को और बेहतर बनाएं।
1. बिन मेरे इक सफर पर मैं रहा, बिन मेरे उस जगह दिल खुल गया, बिन मेरे वो चाँद जो मुझ से छिप गया पूरा रुख़ पर रुख़ रख कर मेरे, बिन मेरे जो ग़मे यार में दे दी जान मैंने हो गया पैदा वो ग़म मेरा, बिन मेरे मस्ती में आया हमेशा बग़ैर मय के खुशहाली में आया हमेशा, बिन मेरे मुझ को मत कर याद हरग़िज याद रखता हूँ मैं खुद को, बिन मेरे मेरे बग़ैर खुश हूँ मैं, कहता हूँ कि अय मैं रहो हमेशा बिन मेरे रास्ते सब थे बन्द मेरे आगे दे दी एक खुली राह बिन मेरे मेरे साथ दिल बन्दा कैक़ूबाद का वो कैक़ूबाद भी है बन्दा बिन मेरे मस्त शम्से तबरीज़ के जाम से हुआ जामे मय उसका रहता नहीँ बिन मेरे (कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 128, कैक़ूबाद-कैक़ूबाद नाम से रूम में दो सेलजुक सुल्तान हुए, एक 1220-37 ई. और दूसरे 1249-57 ई. ये ज़िक़्र कैक़ूबाद दुव्वम का ही होना चाहिये। चुनौती ग़ालिब ने भी दी थी शहंशाह को लेकिन इस तरह प्रत्यक्ष नहीं, रूमी की सांसारिकता को ठोकर का ये अच्छा उदाहरण है ।) 2. हंगामे रात के हम आ गए चूँकि हंगामे में रात के ले आये क्या-क्या दरया से रात के रात के परदे में है वो छिपा हुआ गवाह दिन भला बराबर में है कब रात के सोना चाहेगा नहीं, नींद से करे गुरेज़ जो कि देखे नहीं उसने तमाशे रात के जान बहुत पाक और बस पुरनूर दिल बँधा रहा, लगा रहा, बन्दगी में रात के रात तेरे आगे है जैसे काली पतीली क्योंकि चखे नहीं तूने हलवे रात के लम्बी ये राह है रफ़्तार दे मेरे यार लम्बाइयाँ हैं और चौड़ाइयाँ हैं रात के हाथ मेरे बन्द हैं सब काम-काज से सुबह तलक हाथ मेरे हवाले रात के पेशावरी कारोबार है अगर दिन का लुत्फ़ अलग हैं ब्योपार के रात के मुझे फ़ख़्र अपने शम्सुद्दीन तबरेज़ी पर हसरतें दिन की तू तमन्ना रात के 3. मैकदे में आज नशे से बैठे हैं रिन्दो जैसे मैकदे में आज ज़हद न करेंगे और न नमाज़ पढ़ेंगे आज क्या बोलूं क्या महफ़िल क्या मय है आज क्या साक़ी, क्या मेहरबानी, क्या लुत्फ़ आज ना हिज्र का कोई निशान है, ना बू है दिलदार से मेल और विसाल है आज आज मिलते तोहफ़े और चुम्मे साक़ी से प्याले हैं, मस्तियां हैं, और शराबें हैं आज आज मस्ती में जानूँ ना सुबह से शाम गुज़र रहे हैं ज़माने लम्हों की तरह आज जल पड़े हैं आज़ फ़ित्ने में लग कर सभी इस आँगन की मजलिस में हाय व हू है आज ख़ुद से निकल कर पूजते हैं सभी शराब को साक़ी के देखे बिन हम पर होती नहीं करामात शम्सुद्दीन तबरेज़ी ने की न कोई खुराफात तौहीद की मय ढाल सब यारों को दी आवाज़ (रिन्द-पक्का शराबी, हिज्र-जुदाई, फ़ित्ने-दंगे,हंगामे, मजलिस-सभा, तौहीद-अद्वैत) 4. हमारे सुरसाज़ चाहे तोड़ दो हमारे साज़ अय मुल्ला साज़ हमारे पास हजारों और भी हैं इश्क़ के पन्जों में हम गिर गए जो क्या फ़िक्र जो बाजे-बन्सी कम हुए हैं सारे जहाँ के साज़ जो जल भी जाएँ बहुत सुरसाज़ तो भी छिप कर खड़े हैं तरंग और तान उनकी गई आसमां तक मगर उन बहरे कानों में कुछ आता नहीं है दुनिया के चराग़ व शमा सब बुझ भी जाएँ तो ग़म क्या, चकमक जहां में कम नहीं है ये नग़मा तो एक तिनका दरिया के ऊपर गौहर दरिया की सतह पर आता नहीं है पर हुस्न उस तिनके का जानो गौहर से उस चौंध की अक्स की अक्स हम पर गिरी है ये नग़में सारे वस्ल के शौक़ की हैं शाख़ें और मूल और शाख़ कभी बराबर नहीं हैं तो बन्द कर ये मुँह और दर खोल दिल का उस राह से बातें रूहों से फिर किया कर (कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 11, चकमक-आग जलाने का पत्थर, गौहर-मोती) 5. मूल के मूल में आ कब तलक उलटा चलेगा, अब सीधे आ छोड़ कुफ़्र की राह, अब चल दीन की राह इस डंक में देख दवा, और डंक खा अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ हरचंद है तू इस मिट्टी का ही बना सच के मोती के धागों से अन्दर बुना ख़ुदाई नूर का ख़ज़ांची तुझको चुना अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ बेखुदी से जब तू खुद को बाँध लेगा तो जान कि खुदी की क़ैद से खुलेगा और हज़ार बन्धन तोड़ तू उड़ चलेगा अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ ख़लीफ़ा की पुश्त से तू पैदा हुआ है पसरे इस खोटे जहाँ को देखता है लानत तू इतने पर ही खुश घूमता है अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ हरचंद इस जहाँ का तावीज़ है तू अन्दर छिपे ख़ज़ानों की ख़ान है तू झाँक अपनी छिपी आँखें खोल के तू अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ ख़ुदा के जलाल से भर कर तू पैदा हुआ है सितारे और सगुन नेक भी बरपा हुआ है वो है ही नहीं जिसे तू रो गा रहा है अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ सारे पत्थर में जड़ा तू है एक मानिक करेगा कब तक धोखा हमारी जानिब हुआ जा रहा आँखों से सब ज़ाहिर अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ सरकश यार के पास से आये हो तुम पीकर मस्त फिर भी नाज़ुक और दिलकश आँखों में खुश हो और दिल में आतिश अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ शम्स तबरेज़ी हैं हमारे शाह और साक़ी दे दिया हमारे हाथों में जामे बाक़ी सुबहान अल्ला ख़ालिस ये शराब जा पी अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ (कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 12, डंक खा-चूंकि जो ईश्वर की राह की चीज़ें हैं वो पहले बुरी, दुखद और कड़वी लगती हैं, इसलिए उसकी उपमा डंक से की है, सच-ईश्वर, या अस्तित्व के वास्तविक स्वरूप, ख़लीफ़ा-प्रतिनिधि, यहाँ आशय उन आदम से है जो धरती पर ईश्वर के ख़लीफ़ा हैं, और मनुष्यता जिनकी सन्तान है, बाक़ी-अनन्त अनस्तित्व के जीवन का ज्ञान) 6. गुलाबी गाल तेरे गुलाबी गाल तेरे जब देख पाते हैं होके खुशगवार पत्थरों में राह पाते हैं इक बार घूँघट ज़रा फिर से हटा दो दंग होने का दीवानों को मज़ा दो ताकि आलिम समझी-बूझी राह भूलें हुशियारों की अक़ल की हिल जाएँ चूलें पानी बन जाय मोती, तुम्हारा अक्स पड़ना ताकि आतिश छोड़ दे जलना, जंग करना तुम्हारे हुस्न के आगे चाँद से मुँह मोड़ लूँ जन्नत की झिलमिलाती रौशनियां छोड़ दूँ तुम्हारे चेहरे के आगे न बोलूं - आईना है ये बूढ़ा आसमां तो जंग जैसे खा गया है इस जहाँ में सांस तुमने फूँक दी है इस बेचारे को नई एक शकल दी है ऐ उशना साज़ में कुछ तान लाओ पैनी आँखों के लिए कुछ ख़ाहिश जगाओ (कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 171, सांस तुमने फूँक दी है-अल्ला ने अपने दम (सांस) से दुनिया बनाई, कहा कुन (हो जा), और सब हो गया, उशना-शुक्र ग्रह; शुक्र ग्रह का संगीत से सीधा सम्बन्ध है तो एक तो स्पष्ट अर्थ है ही, दूसरे ब्रह्माण्ड की सूफ़ी कल्पना के अनुसार शुक्र देवदूतों का निवास स्थान है, और विकसित मनुष्य, इन्सानुल कामिल का अगला मक़ाम फरिश्ते हैं इसलिए शायद रूमी ने शम्स या सलाहुद्दीन को उशना के नाम से सम्बोधित किया है) 7. सुने कौन आलाप मेरे पनाह मेरी यार मेरे, शौक की फटकार मेरे, मालिको मौला भी हो, और हो पहरेदार मेरे । नूह तू ही रूह तू ही, कुरंग तू ही तीर तू ही, आस ओ उम्मीद तू है, ग्यान के दुआर मेरे । नूर तू है सूर तू, दौलते-मन्सूर तू, बाजेकोहेतूर तू, मार दिए ख़राश मेरे । कतरा तू दरिया तू, गुंचा-ओ-खार तू, शहद तू ज़हर तू, दर्द दिए हज़ार मेरे । सूरज का घरबार तू, शुक्र का आगार तू, आस का परसार तू, पार ले चल यार मेरे । रोज़ तू और रोज़ा तू, मँगते की खैरात तू, गागरा तू पानी तू, लब भिगो इस बार मेरे । दाना तू ओ जाल तू, शराब तू ओ जाम तू, अनगढ़ तू तैयार तू, ऐब दे सुधार मेरे । न होते बेखुदी में हम, दिल में दर्द होते कम, राह अपनी चल पड़े तुम, सुने कौन आलाप मेरे । (कुरंग=हिरन, सूफ़ी परम्परा में पहुँचे हुए फ़कीर को बाज या परिन्दे की उपमा देने का चलन है, कोहेतूर= कोहेतूर उस पर्वत का नाम है जिस पर मूसा को खुदाई नूर के दर्शन हुए थे, बाजेकोहेतूर= बाजेकोहेतूर से रूमी का इशारा यहाँ शम्स से है, जो उनकी समझ में खुदाई नूर के दर्शन मनमर्जी से कर लेते हैं । खराश मार देने की बात यहाँ कुछ अटपटी लगती है पर शायद रूमी कहना चाहते हैं कि शम्स की तेज़ तर्रार हस्ती के आगे उनका रूहानी तन अनगढ़ और नाज़ुक है, इसी लिये उनके सम्पर्क में खराश लग गई) 8. जादूगर जादूगर तुम अनोखे हो निराले हो । शिकारी, शिकार को बनाने वाले हो ॥ दो देखने की आदत अपनी बहुत पुरानी । जादू चला तुम्हारा हुई आँखें ऐंची तानी ॥ पक गये हो पूरे, शहतूत से हो मीठे । अंगूर क्या अंगूरी, तेरे लिये सब सीठे ॥ मिमियाते थे जो अब तक जम कर गरज रहे हैं । कैसे मोगरे के तन से गुलाब जम रहे हैं ॥ तन के चलने वाले जाते हैं सर झुकाये । खामोश रहने वाले अब हैं आस्मां उठाये ॥ जहालत मे क़ैद थे जो हो गये हैं ग्यानी । संजीदा हो गये हैं जादू से आसमानी ॥ जो तलवार सजाते थे कल जंगे-मैदान में । अब लफ़्ज़ों के वार करते और सिर्फ़ कान में ॥ जादू चला है तेरा चींटी का वक़्त आया । खौफ़ में हैं हाथी जो उनको सदा सताया ॥ जादू न समझो इसको, ज़ुल्म से है जंग । बदल रहे हैं देखो, तक़दीर के वो ढंग ॥ लफ़्ज़ों में मत उलझना, ताकीद है ये उनकी । याद रहे हमेशा, बस सुनो ज़बान हक़ की ॥ नज्में-कविताएं मौलाना रूमी 1. मुरली का गीत (मसनवी की पहली किताब की शुरुआत इसी मुरली के गीत से होती है) सुनो ये मुरली कैसी करती है शिकायत । हैं दूर जो पी से, उनकी करती है हिकायत ॥ काट के लाये मुझे, जिस रोज़ वन से । सुन रोए मरदोज़न, मेरे सुर के ग़म से ॥ खोजता हूँ एक सीना फुरक़त से ज़र्द-ज़र्द । कर दूँ बयान उस पर अपनी प्यास का दर्द ॥ कर दिया जिसको वक़्त ने अपनों से दूर । करे दुआ हर दम यही, वापसी होय मन्ज़ूर ॥ मेरी फ़रियाद की तान हर मजलिस में होती है । बदहाली मे होती है और खुशहाली में होती है ॥ बस अपने मन की सुनता समझता हर कोई । क्या है छिपा मेरे दिल मे, जानता नहीं कोई ॥ राज़ मेरा फ़रियादों से मेरी, अलग़ तो नही । ऑंख से, कान से ये खुलता मगर जो नहीं ॥ तन से जान और जान से तन छिपा नहीं है । किसी ने भी मग़र जान को देखा नहीं है ॥ हवा है तान मे मुरली की ? नहीं सब आग है । जिसमें नहीं ये आग, वो तो मुर्दाबाद है ॥ मुरली के अन्दर आग आशिक की होती है । आशिक की ही तेज़ी मय में भी होती है ॥ हो गई मुरली उसी की यार, पाई जिसमें पीर । दे दिया उनको सहारा, कर मेरा पर्दा चीर ॥ मुरली सा ज़हर भी दवा भी, किसने देखा है । हमदर्द सच्चा मुरली जैसा किसने देखा है ॥ खूं से भरी राहों से मुरली आग़ाज़ करती है । रूदाद गाढ़े इश्क की मजनूं की कहती है ॥ होश से अन्जान वो सब, जो बेहोश नहीं है । इस आवाज़ को जाने वो क्या, जिसे कान नहीं है ॥ दर्द ऐसा मिला जो है हर वक्त मेरे साथ । वक्त ऐसा मिला, हर लम्हा तपिश के साथ ॥ बीते जा रहे ये दिन यूँ ही, कोई बात नहीं । तू बने रहना यूँ ही, तुझ सा कोई पाक नहीं ॥ जो मछली थे नहीं, पानी से सब थक गये । लाचार थे जो, दिन उनके जैसे थम गये ॥ न समझेंगे जो कच्चे हैं, पकना किसको कहते हैं । नहीं ये राज़ गूदे के, छिलका इसको कहते हैं ॥ तो हो आज़ाद ऐ बच्चे, क़ैदों से दरारों की । रहोगे बन्द कब तक, चॉंदी में दीवारों की ॥ सागर को भरोगे गागर में, कितना आएगा ? उमर में एक दिन जितना भी न आएगा ॥ भरो लोभ का गागर, कभी भर पाओगे नहीं । खुद को भरता मोतियों से, सीप पाओगे नहीं ॥ कर दिया जिसका ग़रेबां इश्क ने हो चाक । लोभ लालच की बुराई से, हो गया वो पाक ॥ अय इश्क तू खुशबाश हो और ज़िन्दाबाद हो । हमारी सब बीमारी का बस तुझसे इलाज हो ॥ तू है दवा ग़ुमान की और है ग़ुरूर की । तुझसे ही क़ायम है लौ, खिरद के नूर की ॥ ये खाक का तन अर्श तक, जाता है इश्क़ से । ख़ाक का परबत भी झूमता गाता है इश्क़ से ॥ आशिको इस इश्क ने ही जान दी कोहे तूर में । था तूर मस्ती में, व थी ग़शी मूसा हुज़ूर में ॥ लबे-सुर्ख के यार से ग़रचे मुझे चूमा जाता । मुझसे भी मुरली सा शीरीं सुर बाहर आता ॥ दूर कोई रहता हमज़बानो से जो हो । बस हो गया गूँगा, सौ ज़बां वाक़िफ़ वो हो ॥ चूँकि गुल अब है नही वीरां बगीचा हो गया । बाद गुल के, बन्द गाना बुलबुलों का हो गया ॥ माशूक़ ही है सब कुछ, आशिक़ है बस पर्दा । माशूक ही बस जी रहा है, आशिक़ तो एक मुर्दा ॥ ऐसा न हो आशिक़ तो इश्क़ का क्या हाल हो । परिन्दा वो इक जिसके गिर गए सब बाल हो ॥ होश में कैसे रहूँ मैं, बड़ी मुश्किल में हूँ । यार को देखे बिना, हर घड़ी मुश्किल में हूँ ॥ अरमान है इश्क का, इस राज़ को दुनिया से बोले । मुमकिन हो ये किस तरह, आईना जब सच न खोले ॥ सच बोलता आईना तेरा, सोच क्यूँ नहीं ? चेहरा उसका ज़ंग से, जो साफ है नहीं ॥ (हिकायत-कहानी, फ़ुरक़त-विरह, ज़र्द-पीला, मजलिस-सभा, आग़ाज़-शुरुआत, चाक-विदीर्ण, फटा हुआ, खिरद-अक़ल,बुद्धि, अर्श-आसमान, कोहे तूर-तूर नाम का पर्वत, जिस पर मूसा को खुदाई नूर के दर्शन हुए, ग़शी-बेहोशी, शीरीं-मीठा, वाक़िफ़-जानकार, बाल-पर,डैने) बिखरे मोती मौलाना रूमी 1. दुश्वार हज़रते ईसा से पूछा किसी ने जो था हुशियार इस हस्ती में चीज़ कया है सबसे ज़्यादा दुश्वार बोले ईसा सबसे दुश्वार ग़ुस्सा ख़ुदा का है प्यारे कि जहन्नुम भी लरज़ता है उनके डर के मारे पूछा कि खुदा के इस क़हर से जां कैसे बचायें ? वो बोले अपने ग़ुस्से से इसी दम नजात पायें (दुश्वार=मुश्किल, जहन्नुम=नर्क,दोज़ख़, नजात= छुटकारा) 2. नायाब इल्म सोने और रुपये से भर जाय जंगल अगर बिना मर्ज़ी ख़ुदा की ले नहीं सकते कंकर सौ किताबें तुम पढ़ो अगर कहीं रुके बिना नुक़्ता ना रहे याद खुदा की मर्ज़ी के बिना और गर ख़िदमत करी, न पढ़ी एक किताब गिरेबां के अन्दर से आ जाते इल्म नायाब 3. लतीफ़ा लतीफ़ा एक तालीम है, ग़ौर से उस को सुनो मत बनो उसके मोहरे, ज़ाहिरा में मत बुनो संजीदा नहीं कुछ भी, लतीफ़ेबाज़ के लिए हर लतीफ़ा सीख है एक, आक़िलों के लिए (तालीम=शिक्षा, ज़ाहिरा=सामने) 4. बदशकल बदशकल ने खुद को आईने के सामने किया ग़ुस्से से भर गया और चेहरा पलट लिया बदगुमान ने जब किसी का कोई जुर्म देखा दोज़ख़ की आग में वो भीतर से जल उठा अपने ग़ुरूर को दीन की हिमायत बताता है खुदी के कुफ़्र को ख़ुद में देख नहीं पाता है (आईने=शीशे, बदगुमान=जो भ्रम में है) 5. तौबा जो उमर गुज़र गई, जड़ उसकी है ये दम सींचो तौबा से उसे, गर रही नहीं है नम उस उमर की जड़ को दो आबे-हयात ज़रा ताकि वो दरख़्त हो जाय फिर से हरा-भरा सब माज़ी तेरा इस पानी से सुधर जाएगा ज़हर पुराना सब इस से शक्कर हो जाएगा (दम=साँस,पल, आबे-हयात=अमृत, माज़ी=भूत-काल) 6. तौबा तन मेरा और रग मेरी तुम से भरी हुईं है तौबा को रखने की मुझ में जगह नहीं है तो तय है कि तौबा को दिल से निकाल दूं जन्नत की ज़िन्दगी से भी तौबा कैसे करूं ? 7. इश्क़ इश्क़ हरा देता है सब को, मैं हारा हुआ हूं खारे इश्क़ से शक्कर सा मीठा हुआ हूं ऐ तेज़ हवा ! मैं सूखा पत्ता सामने तेरे हूं जानता नहीं किस तरफ़ जा कर मैं गिरूं 8. दर्द दर्द पुरानी दवा को नया बना देता है दर्द उदासी की हर शाख़ काट देता है दर्द चीज़ों को नया बनाने का कीमिया है मलाल कैसे हो उठ गया दर्द जहाँ है अरे नहीं बेज़ार हो कर मत भर आह सर्द खोज दर्द, खोज दर्द, दर्द, दर्द और दर्द 9. रूह के राज़ जब देखो कोई अपना खोल दो रूह के राज़ देखो फूल तो गाओ जैसे बुलबुल बाआवाज़ लेकिन जब देखो कोई धोखे व मक्कारी भरा लब सी लो और बना लो अपने को बन्द घड़ा वो पानी का दुश्मन है बोलो मत उसके आगे तोड़ देगा वो घड़े को जाहली का पत्थर उठाके 10. जंग और जलाल चूंकि नबियों में वो रसूल रखते थे तलवार उनकी उम्मत में हैं जवांमर्द और जंगवार जंग और जलाल हमारे दीन की निशानी है परबत व गुफ़ा ईसाई दीन में पाई जानी है 11. दिल कहा पैग़म्बर ने हक़ ने है फ़रमाया न किसी ऊँचे में न नीचे में हूँ समाया अर्श भी नहीं, न ज़मीन व न आसमान समा सकता है मुझे, प्यारे यकीन जान मोमिन के दिल में समा जाता हूँ, है अजब चाहो तो मेरी उन दिलों में से कर लो तलब 12. रहबर रहबर का साया खुदा के ज़िक़्र से बेहतर है सैंकड़ों खानों व पकवानों से सबर बेहतर है देखने वाले की आंख सौ लाठियों से बेहतर है आंख पहचान लेती क्या मोती क्या पत्थर है 13. हू से हवा में शकलें बेशकली से बाहर आईं, गई उसी में क्योंकि 'सच है हम वापस लौटते उसी में' तू मर रहा हर दम व वापस हो रहा हर दम कहा मुस्तफ़ा ने बस एक दम का ये आलम हमारी सोच एक तीर है उस हू से हवा में हवा में कब तक रहे ? लौट जाता खुदा में (सच...उसी में=कुरान में, मुस्तफ़ा= मुहम्मद साहब की उपाधि, हू=सूफ़ियों का खुदा को बुलाने का एक नाम) 14. मुख़ालिफ़ खुदा ने रंज व ग़म इस लिए हैं बनाए ताकि ख़िलाफ़ उसके खुशी नज़र आए मुख़ालफ़त से सारी चीज़ें होती हैं पैदा कोई नहीं मुख़ालिफ़ उसका वो है छिपा 15. मस्जिद बेवकूफ़ मस्जिद में जाकर तो झुकते हैं मगर दिल वालों पर वो सितम करते हैं वो बस इमारत है असली हक़ीक़त यहीं है सरवरों के दिल के सिवा मस्जिद नहीं है वो मस्जिद जो औलिया के अन्दर में है सभी का सजदागाह है, खुदा उसी में है (सरवर=गुरू,मुर्शिद, औलिया=संत) 16. पहाड़ पहाड़ की गूंज ख़ुद से आगाह नहीं है पहाड़ की अक़ल को रूह से राह नहीं है बेकान व बेहोश वो बस आवाज़ करता है जब तुम चुप हो गए, वो भी चुप करता है 17. एक वो बेमकान, खुदा का नूर जिसके अन्दर है उसको माज़ी, मुस्तक़्बिल व हाल किधर है ? तेरे रिश्ते से है माज़ी और मुस्तक़्बिल वो एक चीज़ है दोनों, तू समझता है कि दो (माज़ी=भूत काल, मुस्तक़्बिल=भविष्य, हाल=वर्तमान) 18. खुदा जो कुछ भी तुम सोचते हो, फ़ना है मानो वो जो तुम्हारी सोच में नहीं, उसे खुदा जानो 19. यार यार रास्ते में सहाय और सहारा है ग़ौर से देखो यार रास्ता तुम्हारा है 20. पस्ती खुश रह ग़म से कि ग़म फन्दा है दीदार का पस्ती की तरफ़ तरक़्क़ी, ढंग है इस राह का 21. बुत तुम्हारी खुदी का बुत, सारे बुतों की है जड़ वो तो बस साँप, इस में अजगर की जकड़ 22. सूफ़ी ऐ दोस्त सूफ़ी का है इस वक़्त में रहना इस तरीक़े की शर्त नहीं कल की बात कहना 23. सूफ़ी पूछा किसी ने कि कैसा होता है सूफ़ी जिसे रंज आए जब, तो होती है खुशी 24. दरवेश बोला कि दुनिया में कोई दरवेश नहीं है गर हो कोई दरवेश, तो वो दरवेश 'नहीं है' रुबाईयां मौलाना रूमी रुबाईयां 1 वो पल मेरी हस्ती जब बन गया दरया चमक उठ्ठा हर ज़र्रा होके रौशन मेरा बन के शमा जलता हूँ रहे इश्क पर मैं बस लम्हा एक बन गया सफ़रे उम्र मेरा 2 हूँ वक्त के पीछे और कोई साथ नहीं और दूर तक कोई किनारा भी नहीं घटा है रात है कश्ती मैं खे रहा पर वो खुदा रहीम बिना फज्ल के नहीं 3 पहले तो हम पे फरमाये हज़ारों करम बाद में दे दिए हज़ारों दर्द ओ ग़म बिसाते इश्क पर घुमाया खूब हमको कर दिया दूर जब खुद को खो चुके हम 4 ऐ दोस्त तेरी दोस्ती में साथ आए हैं हम तेरे कदमों के नीचे बन गए ख़ाक हैं हम मज़्हबे आशिकी में कैसे ये वाजिब है देखें तेरा आलम व तुझे न देख पाएं हम